पाठक को वजह सबूत की जरूरत नहीं, यह खबर थोपना कहलाता है

संपादकीय

अभिनेता सैफ अली पर हुए हमले में चाकू तीसरे टुकड़े के मिलने की खबर का पोस्टमार्टम

आज लगभग सभी अखबारों में अभिनेता सैफ अली खान पर हुए हमले को लेकर एक फॉलोअप छपा है। जिसमें पुलिस के हवाले से बताया गया है कि आरोपी ने सैफ अली खान पर जो चाकू इस्तेमाल किया था, उसका तीसरा टुकड़ा बरामद हो गया है। यह चाकू आरोपी और सैफ अली खान के बीच हुई हाथापाई में टूट गया था। इसे कल मुंबई पुलिस ने बरामद कर लिया था। यह टुकड़ा पुलिस ने मुंबई के बांद्रा इलाके के तालाब के पास बरामद किया, इसलिए आज इस खबर का पोस्टमार्टम करना जरूरी है।

दरअसल यह पुलिस के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है कारण कि, पुलिस अपनी सारी जांच वजह सबूत के आधार पर करती है और उसे कोर्ट में अभियोजन के दौरान यह साबित करना होता है कि सैफ अली खान पर जिस चाकू से हमला किया गया था वह चाकू कौन सा था। चूंकि चाकू टूट गया था तो उसके टुकड़े भी कोर्ट में बतौर वजह सबूत पेश करने जरूरी है। कानूनी नियमों के मुताबिक 90 दिनों के भीतर भीतर जब भी पुलिस आरोपी के खिलाफ कोर्ट में चार्ज शीट पेश करेगी तो उसे वजह सबूत भी दिखाना होगा।

मेरा मानना है कि यह पुलिस के लिए वजह सबूत है मगर पाठक के लिए इस खबर की कोई वैल्यू नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आरोपी को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है ऐसे में खबर की अब कोई वैल्यू नहीं रही। यह खबर पढ़ाई नहीं जा रही है बल्कि पाठकों पर थोपी गई है।

यह खबर मुंबई वह महाराष्ट्र के पाठकों के लिए अच्छी सूचना हो सकती है मगर देश के अन्य राज्यों के अखबारों में इसे प्रथम पेज पर प्रकाशित करने को किसी सूरत में पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता।

. प्रमोद आचार्य