

पद्म भूषण मिलने पर विशेष आलेख..
आलेख: मधुप्रकाश लड्ढा, राजसमंद

- किसी के सफर की शुरुआत कैसे और कहां से होती है इसका पता उसके मंजिल पर पहुंचने के बाद ही होता है। मंजिल तक पहुंचते – पहुंचते कितने अफसाने बनते और बिगड़ते है यह तो उसी को मालूम होता है जिसने वक्त के हर सितम को मुस्कुराते हुए स्वीकार किया हो।
हम यहां बात कर रहे है हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित होने वाली वात्सल्य ग्राम की अधिष्ठात्री दीदी मां साध्वी ऋतंभरा की।
साध्वी ऋतंभरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। हर हिन्दू के हृदय में हिंदुत्व का जोश भरने वाली दीदी मां को कौन नहीं जानता ! हिंदू समाज ही नहीं, विधर्मी भी अच्छे से जानते हैं कि शौर्य और वात्सल्य कि प्रतिमूर्ति में राष्ट्र – धर्म का जज़्बा ऐसा कूट – कूट कर भरा है कि वे असंभव को भी संभव कर दिखाती है। एक बार जो ठान लेती है तो पाकर ही रहेगी। चाहे राम मंदिर निर्माण की अलख हो या वात्सल्य ग्राम की ललक। जो चाहा वो करके दिखाया।
सफ़र के शुरुआती दौर में साध्वी ऋतंभरा ने हिंदुत्व कि उस कमजोर डोर को थामा जब हिन्दू अपने आपको हिंदू कहने में भी शर्म महसूस करता था। उस भयानक दौर में विधर्मियों से दो – दो हाथ करने का मतलब था राजनीतिक सत्ता को उंगली दिखाना। उस चुनौती को स्वीकार करते हुए देशभर में प्रवास किया ओर राम मंदिर निर्माण की हुंकार भरी। इसका परिणाम यह निकला कि वर्षों से निस्तेज पड़े हिन्दू समाज में चेतना का संचार हुआ और उसकी परिणीति स्वरूप अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण का संकल्प पूर्ण हुआ।
राजनीतिक हलकों में कयास लगाए जाने लगे कि क्या साध्वी ऋतंभरा भारतीय राजनीति का हिस्सा बनेगी ? लेकिन ये कयास, कयास ही निकला। एक छोटे से अप्रत्याशित घटनाक्रम ने साध्वीजी की जीवनचर्या को फिर बदल दिया। अनायास ही एक लावारिश नवजात शिशु ने गोद में आकर साध्वी ऋतंभरा के वात्सल्य को जगा दिया और वो साध्वी से दीदी मां भी बन गई।
वात्सल्य ग्राम वृन्दावन में बेसहारा दादी – नानी, विधवा – परित्यक्ता मां – बहिनों और लावारिश नवजात बच्चों को एक छत के नीचे भाव संबंधों के परिवार में गूंथकर एक ऐसा अनूठा प्रयोग किया की वृद्धाश्रम और अनाथालय बेमानी लगने लगे। साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि रघुनाथ और विश्वनाथ के देश में कोई अनाथ कैसे हो सकता है।
दीदी मां साध्वी ऋतंभरा के इस ऋण से हिंदू समाज कभी उऋण नहीं हो सकता। आपके नाम की तरह आपका संघर्ष और आपका योगदान सदियों तक हिंदू समाज को दिशा देता रहेगा।
धार्मिक और सांस्कृतिक महाकुंभ की राजधानी अभी प्रयागराज है जहां लोग 144 वर्ष बाद डुबकी लगा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ शौर्य, स्नेह और वात्सल्य का अगर कोई कुंभ है तो वो है साध्वी ऋतंभरा की गोद। पिछले 25 वर्षों में मुझे तो इस अलौकिक कुंभ में कई बार डुबकी लगाने का अवसर मिला। कभी गुरु, कभी मां तो कभी दीदी बनकर मेरे तन मन को तृप्त किया है। मां गंगा की गोद से दूर रहकर भला कौन तृप्त हो पाया है ?
अनेक लोग पद्म भूषण से अलंकृत होते हैं, पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि साध्वी ऋतंभरा से भूषण स्वयं विभूषित हुआ है। ईश्वर से आपकी लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ की प्रार्थना करते हुए इस पद्म भूषण की सुखद घोषणा के लिए हम मोदी सरकार का आभार व्यक्त करते हैं।
- मधुप्रकाश लड्ढा, राजसमंद



