नागौर है वंशवाद की राजनीति का गढ: अधिकांश प्रत्याशियों के बाप-दादा रहे हैं राजनीति के धुंरधर

राजनीति

खबर का पोस्टमार्टम में पढिए, किन किन नेताओं के परिजन रहे हैं विधायक या सांसद

प्रमोद आचार्य

नागौर // राजस्थान की राजनीति का केंद्र बिन्दु माने जाने वाले नागौर की एक पहचान परिवारवाद या वंशवाद के गढ की भी है। यहां नेता बनते नहीं है बल्कि पैदा होते हैं। कई बडे राजनीतिक घराने ऐसे हैं जहां के बेटे-पोते-पोतियों ने राजनीति में नई इबारत लिखी है। मेरा यह आज का पोस्टमार्टम इन्हीं वंशवादियों के ईद गिर्द घूमेगा और आपको बताएगा कि किस विधानसभा की सीट पर कौन कौन प्रत्याशी वंशवाद की उपज है और उन पूर्वजों की वजह से ही उनकी राजनीति चल रही है। इस खबर का पोस्टमार्टम नामक मेरे कॉलम में सभी 10 विधानसभा सीटों का हम पोस्टमार्टम करने जा रहे हैं। जिले की 10 सीटों में से अधिकांश सीटों आज भी प्रत्याशी वंशवादी है तथा अपने बाप-दादाओं के नाम पर वोट मांग रहे हैं। देश की अनेक पार्टियां भले ही वंशवाद व परिवादवाद को नकारे मगर इससे कोई अछूती नहीं है। वंशवाद के खिलाफ सर्वाधिक मुखर भाजपा ने तो कांग्रेस के वंशवादी राजनीतिक घराने की डा ज्योति मिर्धा को टिकट देकर अपने ही दावे को खोखला कर दिया है। ऐसा भाजपा पहले भी कर चुकी है जब उन्होंने डेगाना के पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा को तथा पूर्व सांसद राम रघुनाथ चौधरी की बेटी पूर्व जिला प्रमुख बिन्दू चौधरी को लोकसभा का टिकट दिया था। हालांकि ये दोनों नेताओं ने वापिस कांग्रेस का दामन थाम लिया था। उधर लाडनूं डीडवाना, मकराना, नावां, नागौर, खींवसर ऐसी सीटें हैं जहां पुराने नेताओं की दूसरी या तीसरी पीढी इस बार चुनाव मैदान में है।

सबसे पहले बात नागौर की

नागौर में भाजपा से कांग्रेस छोड आई पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा मैदान में है। इनके दादा स्व नाथूराम मिर्धा कदावर जाट नेता रहे हैं और उन्होंने कई पाटियों से चुनाव लडा और जीते भी। उनके नाम पर ज्योति मिर्धा अब वोट मांग रही है। कांग्रेस ने इस बार हरेंद्र मिर्धा को मैदान में उतारा है। लगातार 4 चुनाव हारने का अनूठा रिकॉर्ड भी उनके नाम ही है मगर पिफर भी कांग्रेस ने ज्योति को घेरने के लिए उनके रिश्ते में चाचा हरेंद्र मिर्धा को वापिस मैदान में उतार दिया है। हरेंद्र मिर्धा के पिता स्व रामनिवास मिर्धा कई बार सांसद व विधायक रहे है तथा इंदिरा गांधी की कैबिनेट में रहकर खूब चर्चित भी हुए थे। अब चार बार एमएलए के चुनाव में हारने के बाद भी हरेंद्र मिर्धा अपने पिता का नाम लेकर ही वोट मांग रहे हैं। उधर कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने से नाराज हुए कांग्रेस के पूर्व मंऋी हबीर्बुरहमान अशरफी लांबा ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोकी है। हबीबुरर्हमान के बागी होने से कांग्रेस के वैसे ही पसीने छूट रहे हैं मगर ये हबीबुरर्हमान के पिता मोहम्मद उस्मान भी दो बार विधायक रह चुके हैं।

डेगाना के दोनों उम्मीदवार वंशवादी राजनीति के चेहरे

डेगाना विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने अपने वर्तमान विधायक विजयपाल मिर्धा पर ही दांव खेला है तो भाजपा ने पूर्व मंऋी अजय क्लिक को मैदान में उतारा है। पिछले चुनाव में ये विजयपाल से ही हारे थे। विजयपाल के पिता रिछपाल मिर्धा खुद डेगाना से विधायक रह चुके हैं। इसी तरह अजय क्लिक के पिता डेगाना के विधायक सहित नागौर लोकसभा सीट से सांसद भी रह चुके हैं। इस तरह डेगाना में वंशवादी राजनीति जारी है।

हनुमान बेनीवाल के पिता भी रहे हैं विधायक

भाजपा कांग्रेस के अलावा आरएलपी भी परिवादवाद की शिकार है। आरएलपी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल तथा उनके छोटे भाई खींवसर विधायक नारायण बेनीवाल के पिता स्व रामदेव चौधरी भी मूंडवा सीट से विधायक रह चुके हैं। वर्ष 2008 के परिसीमन में मूंडवा सीट को बदलकर खींवसर कर दिया गया था। हनुमान बेनीवाल जब 2018 के चुनाव तक खींवसर से ही विधायक थे मगर 2019 में लोकसभा के सदस्य बन जाने पर उन्होंने भी परिवादवाद का कार्ड खेलते हुए अपने ही सगे छोटे भाई नारायण को मैदान में उतारकर खींवसर का विधायक बनवा दिया। ऐसे में खींवसर सीट भी परिवादवाद से जुदा नहीं है। जबकि हनुमान बेनीवाल आए दिन मिर्धाओं पर वंशवाद फैलाने का अरोप लगाते रहते हैं। जबकि खुद इससे अछूते नहीं है। उधर खींवसर से कांग्रेस ने कुचेरा नगरपालिका के लगातार दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए युवा नेता तेजपाल मिर्धा को टिकट दिया है। ये भी नाथूराम मिर्धा के पोते हैं और ज्योति के चचेरे भाई व पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा के सगे भतीजे हैं। यहां भी कांग्रेस ने परिवादवाद का कार्ड खेला है।

चेतन डूडी के पिता रहे हैं कांग्रेस के विधायक

उधर डीडवाना में कांग्रेस प्रत्याशी वर्तमान विधायक चेतन डूडी भी वंशवाद की राजनीति से ही विधायक बने हैं। इनके पिता स्व रूपाराम डूडी यहां से दो बार विधायक रह चुके हैं। उनके निधन के बाद कांग्रेस ने उनके बेटे चेतन डूडी पर दांव खेला और वे विधायक चुन लिए गए। इस बार वे पिफर मैदान में है।

नावां में कांग्रेस-भाजपा दोनों वंशवाद की शिकार

नावां सीट से कांग्रेस प्रत्याशी महेंद्र सिंह चौधरी और भाजपा विधायक विजयसिंह चौधरी दोनों के पिता अपने अपने समय में इसी सीट से विधायक हर चुके हैं। महेंद्र सिंह के पिता हनुमान सिंह चौधरी तो विजय सिंह के पिता रामेश्वर लाल चौधरी यहां से विधायक रह चुके हैं। हालांकि दोनों के पिता कांग्रेस से ही विधायक रहे बाद में विजयसिंह के भाई दारासिंह परिवादवाद को आगे बढाते हुए राजनीति में उतरे मगर उन्हें सफलता नहीं मिली तो उनके भाई विजयसिंह ने कांग्रेस छोड भाजपा का दामन थाम लिया और 2013 में वे पहली बार भाजपा से विधायक चुने गए। पिछला चुनाव हार गए मगर इस बार पिफर भाजपा ने उन्हें टिकट दिया है। इस तरह यहां भी वंशवाद की राजनीति हावी है।

मकराना में अब आया वंशवाद

मकराना की राजनीति में पहले वंशवाद नहीं था मगर अब आ गया है। यहां भाजपा ने पूर्व विधायक श्रीराम भींचर की बहुरानी सुमिता भींचर को टिकट देकर वंशवाद की राजनीति को आगे बढाया है। उधर कांग्रेस ने पूर्व विधायक जाकिर हुसैन गैसावत को वापिस उतारा है। जाकिर की बेटी अभी नगर परिषद मकराना की सभापति है इस तरह वे परिवादवाद को बढावा दे रहे हैं। कुल मिलाकर मकराना में अब वंशवाद की राजनीति शुरू हो गई है।

लाडनूं में भी आया वंशवाद

लाडनूं में अभी कांग्रेस के मुकेश भाकर विधायक है तथा कांग्रेस ने एक बार पिफर उन पर दांव खेला है मगर यहां भाजपा ने पूर्व विधायक स्व मनोहर सिंह के बेटे करणीसिंह को टिकट देकर वंशवाद की राजनीति को बढा दिया है। पिता के स्वर्गवास होने के बाद बीजेपी ने करणीसिंह को टिकट दिया है।

जायल, मेडता व परबतसर में अभी वंशवाद नहीं

नागोर जिले की ये 3 सीटें फलहाल वंशवाद की राजनीति से अछूती है। इसमें जायल व मेडता अनुसूचति जाति के लिए आरक्षित है इसलिए यहां आपको वंशवाद दिखाई नहीं देगा। यहां पिछले चुनाव में आरएलपी से जीती इंदिरा बावरी को बेनीवाल ने एक बार पिफर टिकट दिया है तो पिछली बार कांग्रेस के बागी रहे लक्ष्मणराम मेघवाल कलरू भाजपा में शामिल होकर टिकट लेकर आए हैं। वहीं परबतसर सीट पहले लंबे समय तक आरक्षित रही थी अब सामान्य सीट है मगर वहां वंशवाद जैसा कुछ नहीं है। यहां युवा नेता के रूप में उभरे विधायक रामनिवास गावडिया एक बार पिफर कांग्रेस से मैदान में है तो उनके सामने बीजेपी ने पूर्व विधायक मानसिंह किनसरिया को उतारा है।

बहरहाल, नागौर की 10 में से 7 सीटों पर वंशवाद की राजनीति हावी है। इन सीटों पर कई नए पुराने नेता उभरने की कोशिश करते है और टिकट के लिए दौडधूप भी करते हैं मगर एनवक्त पर वंशवाद की राजनीति आडे आ जाती है और नए चेहरों को टिकट नहीं मिल पाता। इससे दोनों दलों के सक्रिय नेताओं में भी अंदरखाने रोष है मगर उनका रोष खुलकर सामने नहीं आने से वंशवाद लगातार बढता जा रहा है।

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