10 साल के वनवास के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी, 80 में से 42 सीटें जीतकर बहुमत किया हासिल

राजनीति

भाजपा 27 पर अटकी, 9 निर्दलीयों ने भी दिखाया दम; ओवर कॉन्फिडेंस, टिकट वितरण और बागियों ने बिगाड़ा भाजपा का गणित

बीकानेर // नगर निगम चुनाव में 10 साल बाद कांग्रेस ने एक बार फिर शहर की सत्ता पर कब्जा कर लिया। लगातार दो बोर्ड में करारी शिकस्त झेलने वाली कांग्रेस ने इस बार जोरदार वापसी करते हुए 80 में से 42 वार्डों में जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। वहीं पिछले 10 साल से नगर निगम में सत्ता पर काबिज भाजपा का प्रदर्शन इस बार बेहद निराशाजनक रहा और पार्टी 27 सीटों पर ही सिमट गई। 9 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत दर्ज कर दोनों प्रमुख दलों को अपनी ताकत का अहसास कराया।
कांग्रेस के लिए यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले दो नगर निगम चुनावों में पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ा था। इस बार कांग्रेस ने न केवल वापसी की, बल्कि स्पष्ट बहुमत हासिल कर बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों के भरोसे रहने की जरूरत भी खत्म कर दी।

भाजपा नेताओं का ओवर कॉन्फिडेंस पड़ा भारी

चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा में आत्मविश्वास कई जगह ओवर कॉन्फिडेंस में बदलता नजर आया। पार्टी ने अपने कई पदाधिकारियों और प्रमुख नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा। टिकट वितरण के दौरान बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और दावेदार नाराज हुए। टिकट से वंचित कार्यकर्ताओं में से कई ने प्रचार से दूरी बना ली। इसका सीधा असर मतदान के दिन पार्टी के बूथ मैनेजमेंट और वोट ट्रांसफर पर भी दिखाई दिया।

भाजपा को उम्मीद थी कि संगठन की ताकत और पिछले 10 साल के बोर्ड के आधार पर वह आसानी से बहुमत हासिल कर लेगी, लेकिन चुनाव परिणामों ने इस आकलन को पूरी तरह उलट दिया। जिन वार्डों में पार्टी को मजबूत माना जा रहा था, वहां भी उसे झटके लगे।

गलत टिकट वितरण ने बिगाड़ा भाजपा का समीकरण

भाजपा की हार की एक बड़ी वजह टिकट वितरण में हुई गलतियां भी मानी जा रही हैं। कई वार्डों में स्थानीय और जातीय समीकरणों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। पार्टी के मजबूत दावेदारों की जगह ऐसे चेहरों को मौका मिला, जिन्हें लेकर कार्यकर्ताओं और स्थानीय मतदाताओं में उत्साह नजर नहीं आया।

इसका सबसे चर्चित उदाहरण महावीर रांका का टिकट प्रकरण रहा। रांका ने नामांकन तक दाखिल कर दिया था, लेकिन अंतिम समय में पार्टी का अधिकृत सिंबल किसी अन्य प्रत्याशी को दे दिया गया। इससे स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में नाराजगी का माहौल बना। चुनाव परिणाम ने संकेत दिया कि इस तरह के फैसलों का भाजपा को कई वार्डों में नुकसान उठाना पड़ा।

कांग्रेस ने नाराजगी को अवसर में बदला

कांग्रेस ने इस चुनाव में भाजपा की अंदरूनी नाराजगी का पूरा फायदा उठाया। पार्टी ने कई वार्डों में स्थानीय समीकरणों को साधते हुए प्रत्याशी उतारे और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखा। कांग्रेस के पक्ष में सत्ता विरोधी माहौल के साथ भाजपा के खिलाफ स्थानीय नाराजगी भी जुड़ गई।

42 सीटों का आंकड़ा कांग्रेस के लिए सिर्फ जीत नहीं, बल्कि 10 साल बाद सत्ता में मजबूत वापसी का संदेश है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस महापौर के लिए किस चेहरे पर दांव लगाती है और पार्टी के भीतर किस गुट का प्रभाव बोर्ड में नजर आएगा।
वहीं भाजपा के लिए 27 सीटों का परिणाम आत्ममंथन का विषय है। 10 साल तक सत्ता में रहने के बाद पार्टी के सामने अब यह सवाल होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि संगठन और सत्ता दोनों की ताकत होने के बावजूद वह बहुमत के आंकड़े से इतनी दूर रह गई।