लेखक को साहित्य रचते समय कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है- मालचंद तिवाड़ी

साहित्य

बीकानेर । अजीत फाउण्डेशन द्वारा आयोजित ‘‘सृजन सौरम लक्ष्मीनारायण रंगा’’ दो दिवसीस समारोह के समापन अवसर ‘‘लक्ष्मीनारायण रंगा रचना संचार -साहित्य, शिक्षा एवं रंगकर्म’’ विषय पर संवाद आयोजित हुआ। संवाद कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि लेखक के सामने लिखते समय कई चुनौतियां होती है। वह अपने लेखन को किस दिशा ले जा रहा है तथा आने वाली पीढ़ि हेतु वह किस प्रकार का साहित्य रच रहा है। इस चुनौती को लक्ष्मीनारायण रंगा ने बखूबी निभाया। रंगा ने अपने रचना संसार में सभी विधाओं पर कलम चलाते हुए नवांकुरों हेतु अवसर प्रदान किए।

मालचंद तिवाड़ी ने रंगा के नाटक लेखन पर बोलते हुए कहा कि उनके द्वारा लिखित नाटक राष्ट्रीय स्तर के है। उन नाटकों का मंचन होना आवष्यक है। साथ ही लक्ष्मीनारायण रंगा द्वारा कृत साहित्य को एक रचना संचलन के रूप में प्रकाशित करने की आवश्यकता है।

संवाद के मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए साहित्यकार एवं लेखक हरीश बी. शर्मा ने कहा कि उनका लक्ष्मीनारायण रंगा से जुड़ाव रंगा द्वारा लिखित नाटक ‘‘अमर शहीद’’ से हुआ। उन्होंने लक्ष्मीनारायण रंगा से सिलसिले वार हुई साहित्यिक चर्चाओं के बारें में बताते हुए कहा कि रंगा सदैव रचनाकार को आगे बढ़ाने तथा उनका सहर्ष मार्गदर्शन करते थे। हरीश ने कहा कि रंगा ने साहित्य सृजन में लोकतंत्र की स्थापना की। उन्होंने अभिव्यक्ति की पैरवी की तथा सृजनात्मक लेखक के पक्षधर रहे। रंगा की लेखनी में जो मौलिकता थी वहीं मौलिकता वह नए साहित्यकारों में देखना पंसद करते थे। उन्होंने अपनी व्यंग्यत्मक रचनाओं से सामाजिक कुप्रथाओं एवं राजनीति पर प्रहार किए।

लक्ष्मीनारायण रंगा के नाटकों में ‘पूर्णमिद्म’ एवं ‘सुमंगळी माधवी’ बहुत प्रसिद्ध नाटक हुए। जिसमें उन्होंने महाभारत के कथानक को लेकर आधुनिक नाटक से जोड़ा।
लक्ष्मीनारायण रंगा ने राजस्थानी भाषा की मान्यता हेतु काफी प्रयास किए। राजस्थानी को राजभाषा का का दर्जा दिलाने हेतु रंगा ने निरन्तर लेखन तथा सरकार से पत्राचार किए। रंगा ने साहित्य की सभी विधाओं पर लिखा। उनके द्वारा लिखी गई लघुकथाएं बहुत बेहतर है। शर्मा ने कहा कि लक्ष्मीनारायण रंगा सिर्फ एक साहित्यकार या रंगकर्मी ही नहीं बल्कि एक भाषाविद और शिक्षाविद भी रहे। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में कई पीढ़ियों को अध्ययन करवाया।

कार्यक्रम संयोजन राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने कहा कि अजित फाउण्डेशन द्वारा इस तरह के आयोजन से ही हम कीर्तिशेष साहित्यकारों को नवपीढि तक पहुंचा सकते है। उन्होंने विश्वास दियाला कि लक्ष्मीनारायण रंगा के साहित्य को ‘संचयन’ के रूप में प्रकाशन हेतु हर संभव प्रयास किए जाएगें।
इस अवसर पर जुगलकिशोर पुरोहित, नरसिंह बिन्नानी, मोहम्मद फारूक, इसरार हसन कादरी, सुनील बोड़ा, गौरीश्ंाकर प्रजापत, डॉ. नीतिन गोयल आदि ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने कहा कि इस तरह के आयोजनों से नवीन पीढि को साहित्य रचने तथा पढ़ने हेतु प्रेरणा मिलती है। कार्यक्रम के अंत में साहित्यकार गिरिराज पारीक से संस्था की तरफ से सभी आगुन्तुकों का आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम में डॉ. अजय जोशी, कासीम बीकानेरी, मनीष जोशी, हनीफ उस्ता, राजेन्द्र जोशी, ओम प्रकाश सुथार, संजय आचार्य, आनन्द छंगाणी, राजेश रंगा, षिवप्रकाश शर्मा, हरिषंकर आचार्य, महेन्द्र पुरोहित सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।