ढड्ढा चौक में सजी आस्था की अनुपम छटा: गवरजा के दर्शन को उमड़ा जनसैलाब

धर्म-कर्म

रियासतकालीन परंपरा आज भी जीवंत

बीकानेर // ढड्ढा चौक में वर्षों पुरानी परंपरा के तहत लगने वाला गवर का मेला इस बार भी श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजित हुआ। रियासतकाल से चली आ रही इस अनूठी परंपरा में चांदमल ढड्ढा की गवर आभूषणों से सुसज्जित होकर श्रद्धालुओं को दर्शन दे रही है। शनिवार रात से शुरू हुआ दर्शन का क्रम रविवार दिनभर जारी रहा, जिसमें ढड्ढा हवेली में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

ईशरजी के बजाय ‘भाया’ के साथ विराजती हैं गवरजा

इस मेले की सबसे खास बात यह है कि यहां पारंपरिक रूप से ईशरजी के स्थान पर ‘भाया’ गवरजा के साथ विराजमान रहते हैं। यह परंपरा इस आयोजन को अन्य स्थानों से अलग और विशिष्ट बनाती है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

कड़ी सुरक्षा के बीच होते हैं दर्शन

मेले के दौरान गवरजा की सुरक्षा के लिए पुलिस प्रशासन मुस्तैद रहता है। श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने और व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं, जिससे दर्शन सुचारू रूप से संपन्न हो सकें।

सेवा और समर्पण का संगम

मेले में अनेक लोग अपनी सेवाएं देते नजर आते हैं। कोई जल व्यवस्था संभालता है तो कोई श्रद्धालुओं के लिए अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराता है। यह आयोजन सामाजिक सहयोग और सामूहिक आस्था का भी प्रतीक बन गया है।

गूंजता है घूमर का सुर, दिखती है संस्कृति की झलक

गवरजा के सामने महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में घूमर नृत्य करती हैं, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर हो उठता है। लोकगीतों और नृत्य के साथ यह मेला केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव का रूप भी ले लेता है। ढड्ढा चौक का यह मेला हर साल आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है, जो नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़े रखने का कार्य कर रहा है।

रियासतकाल से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाना हमारा सौभाग्य” — यशवंत कोठारी

मेले के आयोजक यशवंत कोठारी ने बताया कि ढड्ढा चौक का यह गवर मेला वर्षों पुरानी परंपरा का प्रतीक है, जिसे आज भी पूरे श्रद्धा और विधि-विधान के साथ आयोजित किया जाता है। उन्होंने कहा कि चांदमल ढड्ढा की गवर के दर्शन के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जो इस आयोजन की महत्ता को दर्शाता है।

उन्होंने बताया कि मेले में सुरक्षा, व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाता है। साथ ही स्थानीय लोग भी बढ़-चढ़कर सेवा कार्यों में भाग लेते हैं, जिससे यह आयोजन सामूहिक सहयोग का उदाहरण बन गया है।
यशवंत कोठारी ने कहा कि इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और इसकी गरिमा बनाए रखना ही उनका मुख्य उद्देश्य है।