71 साल से आहूजा परिवार का सदस्य ही बनता है रावण, तीन पीढ़ियों से निभा रहे परंपरा

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दादा ने 23 और चाचा ने 25 साल तक निभाया किरदार, अब तीसरी पीढ़ी के के. कुमार आहूजा 23 साल से अपनी खतरनाक हंसी से रावण बनकर बच्चों को देते हैं आशीर्वाद और बांटते हैं प्रसाद

बीकानेर। छोटी काशी बीकानेर में दशहरे पर निकलने वाले जुलूस की झांकी में रावण का किरदार निभाने की एक अनूठी परंपरा पिछले 71 साल से आहूजा परिवार निभा रहा है। इस परिवार की तीन पीढ़ियां रावण की भूमिका में नजर आ चुकी हैं। खास बात यह है कि दादा, चाचा और भतीजे ने इस किरदार को केवल अभिनय तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे पारिवारिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ाया है।

माधवदास ने 23 साल व शिवाजी आहूजा ने 25 साल निभाया रावण का रोल

बीकानेर के ख्यातनाम आहूजा परिवार में इस परंपरा की शुरुआत स्वर्गीय माधव दास आहूजा ने की थी। उन्होंने शहर में निकलने वाली दशहरे की उत्सव झांकी में 23 साल तक रावण की भूमिका निभाई। इसके बाद दूसरी पीढ़ी में पूर्व आयकर अधिकारी शिवाजी आहूजा ने 25 साल तक इस परंपरा को आगे बढ़ाया। अब तीसरी पीढ़ी के पत्रकार, रंगकर्मी और एंकर के. कुमार आहूजा पिछले 23 वर्षों से रावण का किरदार निभा रहे हैं।

अब के. कुमार आहूजा खतरनाक हंसी से बच्चों को देते हैं आशीर्वाद

के. कुमार आहूजा अपनी खास और खतरनाक हंसी के कारण रावण के किरदार में अलग पहचान रखते हैं। शहर के परकोटे में निकलने वाली उत्सव झांकी के दौरान उनका रौद्र रूप बच्चों के आकर्षण का केंद्र रहता है। रावण के वेश में वे एक ओर नन्हे बच्चों को आशीर्वाद देते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें टॉफियां, बिस्किट और प्रसाद बांटते हैं। इस तरह रावण के परंपरागत रूप के साथ वे बच्चों के बीच अपनत्व का भाव भी जोड़ते हैं।

पत्नी को लोग कहते हैं ‘मंदोदरी भाभी’

जय नारायण व्यास कॉलोनी के सेक्टर नंबर पांच में रहने वाले के. कुमार आहूजा के परिवार की इस परंपरा से आसपास के लोग भी परिचित हैं। उनके पड़ोसी और परिचित उनकी पत्नी को स्नेहपूर्वक ‘मंदोदरी भाभी’ कहकर पुकारते हैं। परिवार के लिए यह संबोधन और रावण के किरदार से जुड़ी पहचान गर्व का विषय है।

रामजी के साथ युद्ध में अभिनय कर प्राण अर्पित करने की इच्छा

के. कुमार आहूजा ने “मरुधरा न्यूज” से बातचीत में बताया कि वे जीवन के 68 बसंत देख चुके हैं। उनकी अंतिम इच्छा है कि वे भगवान श्रीराम के साथ युद्ध के दृश्य में अभिनय करते हुए अपने प्राण उनके चरणों में अर्पित करें। रावण के किरदार के प्रति उनका लगाव और तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत का एक विशिष्ट उदाहरण है।