


इस्कॉन की रथयात्रा में करीब 500 श्रद्धालुओं ने खींचा भगवान जगन्नाथ का रथ
बीकानेर। अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) की ओर से रविवार को भगवान श्री जगन्नाथ, बलदेव एवं सुभद्रा महारानी की भव्य रथयात्रा पूरे धार्मिक उल्लास और भक्तिभाव के साथ निकाली गई। नथूसर गेट से शुरू हुई इस यात्रा में लगभग 500 श्रद्धालु शामिल हुए। पूरे मार्ग में “हरे कृष्ण, हरे राम” और “जय जगन्नाथ” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं का उत्साह ऐसा था कि शहर की सड़कों पर एक दिन के लिए पुरी धाम जैसा नजारा दिखाई दिया।
रथयात्रा में इस्कॉन जोधपुर मंदिर के अध्यक्ष सुंदर लाल प्रभुजी सहित जोधपुर से आए अनेक भक्त भी शामिल हुए। भगवान श्री जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा महारानी एवं सुदर्शन प्रभु की दिव्य झांकी से सुसज्जित रथ श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा। भक्तों ने पूरे उत्साह के साथ रस्सियों से रथ खींचकर स्वयं को धन्य माना।

इस्कॉन बीकानेर के केंद्र प्रभारी श्री संकर्षण प्रिय दास ने भगवान जगन्नाथ की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि कलियुग में भगवान जगन्नाथ करुणा के साक्षात स्वरूप हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग किसी कारणवश मंदिर नहीं पहुंच पाते, उनके उद्धार के लिए स्वयं भगवान रथ पर विराजमान होकर भक्तों के बीच आते हैं। उन्होंने इसे उस चिकित्सक से तुलना करते हुए समझाया, जो गंभीर रोगी के पास स्वयं पहुंचकर उसका उपचार करता है।
रथयात्रा नत्थूसर गेट से विभिन्न प्रमुख मार्गों से होती हुई अग्रसेन भवन के सामने पहुंची, जहां श्रद्धालुओं के लिए भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद वितरित किया गया। यात्रा मार्ग में जगह-जगह रंगोलियां सजाई गईं और श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया। बड़ी संख्या में लोगों ने परिवार सहित रथ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
पूरे मार्ग में हरिनाम संकीर्तन की मधुर ध्वनि गूंजती रही। मृदंग, करताल और झांझ की ताल पर भक्तगण नृत्य करते हुए आगे बढ़ते रहे। अनेक श्रद्धालुओं ने बताया कि उन्हें बीकानेर में ही पुरी की प्रसिद्ध रथयात्रा का दिव्य अनुभव हो रहा है।
रथयात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर खिचड़ी प्रसाद का वितरण भी किया गया, ताकि दर्शनार्थी भगवान का प्रसाद ग्रहण कर सकें। श्रद्धालुओं ने “जगन्नाथ के भात, दुनिया पसारे हाथ” की परंपरा को साकार करते हुए सेवा कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
इस्कॉन के स्वयंसेवकों ने इस अवसर पर संस्थापक आचार्य श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद की आध्यात्मिक पुस्तकों का भी वितरण किया। उनका उद्देश्य श्रद्धालुओं को केवल दर्शन तक सीमित न रखकर नियमित भक्ति, नाम-स्मरण और आध्यात्मिक जीवन से जोड़ना था।



