अरे मूर्खों, साहिल-मुस्कान को सेलिब्रिटी बनाने पर क्यों तुले हो !!

संपादकीय

पोस्टमार्टम : मेरठ कांड के क्रिमिनल की दिनचर्या की घटिया रिपोर्टिंग का पोस्टमार्टम

पिछले कुछ साल से मीडिया में एक नया ट्रेंड बन गया है। क्राइम की सनसनीखेज खबर का उटपटांग फॉलोअप करने का ट्रेंड। क्राइम को कवरेज करने वाले क्राइम रिपोर्टर जाने अनजाने में ही ऐसे अपराधियों को बड़ी सेलिब्रिटी की तरह अखबारों में पेश करते हैं। समझ में नहीं आ रहा कि संपादक नामक जीव अखबारों में या चैनलों में क्या काम कर रहा है। हालांकि क्राइम की हर खबर फॉलोअप मांगती है। पाठक भी यह जानना चाहता है कि क्राइम न्यूज़ में अब नया अपडेट क्या है, मगर क्राइम रिपोर्टिंग करने वाले कुछ नया देने की फिराक में ऐसी ऊंटपटांग रिपोर्टिंग कर देते हैं जो पाठक का ना तो नॉलेज बढ़ाती है ना उसे अपडेट रखती है। मैं खुद शुरुआती दौर में क्राइम रिपोर्टर रहा हु। मैं जानता हूं ये सिर्फ पेज भरने का फार्मूला भर है।

ऐसा ही एक उदाहरण मेरठ के सौरभ हत्याकांड में सामने आया है। जिसमे मुख्य आरोपी साहिल व उसकी प्रेमिका मुस्कान जेल में बंद है। मुस्कान ने अपने पति सौरभ राजपूत की हत्या अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर 3 मार्च को की थी और उसकी बॉडी के टुकड़े-टुकड़े कर उसे ड्रम में भर दिया था। आज के बड़े दैनिक अखबारों में सौरभ हत्याकांड का मुख्य आरोपीय साहिल और उसकी प्रेमिका मुस्कान को लेकर जो फॉलोअप छपा है वह बेतुका है। इसलिए आज उदय भास्कर अपने पोस्टमार्टम नामक कॉलम में उन पत्रकारो की मानसिकता का पोस्टमार्टम करेगा जो क्राइम न्यूज़ के फॉलोअप में नियमों को तार तार कर रहे हैं।

मुस्कान जेल के बैरक में गुमसुम रहती है। मुंह छुपा कर बैठी है सिर्फ खाने और नाश्ते के वक्त चेहरे से कपड़ा हटाती है। अरे पत्रकार बंधुओ, मुझे ये बताओ कि कौनसा अपराधी जेल में खुश रहता है। जेल के बैरक में कोई गुमसुम नहीं रहेगा तो क्या डांस करेगा? उधर साहिल जेल में बेचैन है उसे नशा नहीं मिल रहा है इसलिए उसे नींद भी नहीं आ रही है इसलिए उसकी तबीयत बिगड़ रही है। यह शब्दावली अखबारों में प्रकाशित हुई है। समझ में नहीं आ रहा है यह खबर का कौनसा फॉलोअप है!!

मेरी नजर में तो यह साहिल और मुस्कान को सेलिब्रिटी बनाने का षड्यंत्र मात्र है। पत्रकारों व संपादकों को इस ओर ध्यान देना होगा, क्योंकि अखबारों को लोग आज भी गीता ओर कुरान की तरफ पवित्र मानते हैं उसमें छपा हुआ हर शब्द पढ़ा जाता है और लोग उसे प्रेरणा पाते हैं। बाकी पाठक खुद समझदार है।
आज बस इतना ही।

प्रमोद आचार्य