

पोस्टमार्टम : प्रभारी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर बीकानेर में होते हुए भी ऊंट उत्सव को देखने नहीं गए। बीकानेर के विधायकों ने बनाई दूरी
बीकानेर // हर साल की भांति बीकानेर का प्रसिद्ध ऊंट उत्सव संपन्न हो गया। इस बार ऊंट उत्सव की कला संस्कृति व सांस्कृतिक मूल्यों पर तबादलों का मोह भारी पड़ गया। यही कारण है कि बीकानेर के जनप्रतिनिधियों ने इसमें कोई रुचि नहीं ली। वे किसी भी इवेंट में शामिल तक नहीं हुए। उत्सव में वहीं बरसों पुराने इवेंट हुए, कोई नवाचार भी नहीं हुआ। पहले मिस मरवण व मिस्टर बीकाणा जैसी प्रतियोगिता भी रद्द कर दी गई मगर बाद में विरोध बढ़ा तो उसका आयोजन जरूर हुआ। पर्यटन विभाग लंबे समय से इस उत्सव को अन्तर्राष्टीय स्तर का मानता है मगर विदेशी पर्यटकों की आवक साल दर साल लगातार कम होती जा रही है। इस बार भी बेहद कम संख्या में विदेशी पावणे नजर आए। इस आयोजन में राज्य के पर्यटन मंत्री तो कभी नहीं आए। उससे भी दुखद स्थिति ये रही कि जिले के प्रभारी मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ऊंट उत्सव के अंतिम दिन यानी रविवार को बीकानेर में ही थे। वे रवीन्द्र रंगमंच पर नवनियुक्त कार्मिकों को नियुक्ति पत्र देने बीकानेर आए मगर उन्होंने भी ऊंट उत्सव की विजीट करना उचित नहीं समझा। प्रभारी मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के साथ कल रवीन्द्र रंगमंच पर बीकानेर पूर्व की विधायक सिद्धि कुमारी व डूंगरगढ़ विधायक ताराचंद सारस्वत भी मौजूद रहे मगर उन्होंने भी ऊंट उत्सव में जाना उचित नहीं समझा। इसकी यहां खासी चर्चा रही।

जनप्रतिनिध तबादलों में उलझे इसलिए वे रहे आयोजन से दूर
बीकानेर से एकमात्र केबिनेट मंत्री सुमित गोदारा, नगर विधायक जेठानंद व्यास, कोलायत विधायक अंशुमानसिंह व खाजूवाला के डा. विश्वनाथ भी तीन दिवसीय आयोजन से दूर रहे। जानकारों मानें तो वे इन दिनों जयपुर में डेरा डाले हुए हैं क्याेंकि सरकार ने तबादलों पर से रोक हटा रखी है। पहले 10 जनवरी तक ही तबादले होने थे मगर एनवक्त पर सरकार ने इसकी मियाद 15 जनवरी तक बढ़ा दी। ऐसे में बीकानेर के जनप्रतिनिधियों ने ऊंट उत्सव के बजाय तबादलों में ज्यादा रूचि ली और वे आयेाजन में कहीं नजर नहीं आए।
आयोजन का उद्ददेश्य नहीं हो रहा है साकार
ऊंट उत्सव के अंतिम दिन पहले कतरियासर के धाेरों में और अब इन दिनों रायसर में अनेक आयोजन होते हैं। प्रशासन हर साल आयोजन से जस्ट पहले रायसर के धोरों तक आवागमन सुगम बनाने के लिए झाडियां काटता है मगर साल भर इस इलाके को भूला रहता है। इस औपचारिकता की वजह से ही रायसर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित नहीं हो रहा है जबकि जैसलमेर के सम के धोरों में पूरे साल पर्यटकों की आवक बनी रहती है मगर यहां पर्यटन विभाग सहित समूचा जिला प्रशासन व यहां के जनप्रतिनिधि रायसर के नए डेस्टिनेशन को डवलप करने के लिए कोई रूचि नहीं दिखा रहे हैं। यही वजह है कि सरकार का इस आयोजन के पीछे किसी तरह का उद्देश्य साकार नहीं हो रहा। बीकानेर में भी पूरे साल भर देशी विदेशी पर्यटकों की आवक बनी रहनी चाहिए मगर इस दिशा में कोई भी विभाग ईमानदारी से काम नहीं कर रहा। इसके लिए जनप्रतिनिधियों को ही सक्रिय भूमिका में आना होगा क्योंकि यह ऊंट उत्सव केवल बीकानेर का नहीं बल्कि पूरे राज्य का है। तीस साल की अवधि के बाद भी यह ऊंट उत्सव अभी तक परवान नहीं चढ़ा है। यही वजह है कि देश के चर्चित कलाकारों की यहां अभी तक कोई खास प्रस्तुतियां नहीं हो पाई है जबकि पुष्कर मेले व जैसलमेर के मरू मेले में बॉलीवुड कलाकार प्रस्तुतियां दे चुके हैं।
पशुपालकों ने भी बनाई दूरी, नवीनता की कमी

ऊंट पालक इस आयोजन से हर वर्ष दूरी बढ़ा रहे हैं। उसकी एक वजह यह भी है की ऊंट पालकों को न तो पर्याप्त मानदेय मिल रहा है ना ही कोई मान । स्थानीय स्तर पर होने वाले आयोजन भी वर्षों से कुछ लोगों के हाथों में होने से केवल मात्र औपचारिकता ही की जा रही है। उसमें नयापन लाने की कोशिश नहीं की जा रही। ना ही कोई कलाकार बदलता है ना ही कोई आयोजन में नवीनता देखने को मिलती है। यही कारण है कि इस वर्ष डॉक्टर करणी सिंह स्टेडियम धरणीधर और एनआरसी में दर्शकों की संख्या बहुत कम रही।
बहरहाल, हर साल की तरह प्रशासन ने ऊंट उत्सव तो बेहद कम बजट में ही संपन्न करवा लिया। हर साल की तरह प्रशासन ने अनेक प्रायोजकों को उत्सव में भागीदार बनाकर अपनी रस्म अदा कर ली मगर इस आयोजन से बीकानेर के पशुपालकों, व्यापाारियों, कलाकारों, होटल व्यवसाइयों सहित आमजन को क्या पर्याप्त रोजगार या बिजनेस मिला, ये प्रश्न हर साल की तरह इस बार भी अनुत्तरित ही रहेगा।
– प्रमोद आचार्य



