खेल लेखक और समीक्षक स्व. झंवर लाल व्यास ‘रंगीला’ की स्मृति में 21 साल से बांट रहे तुलसी के पौधे, अब तक 10 हजार से अधिक पौधे घर-घर पहुंचे

समाज

दशहरे पर जन्म जयंती के अवसर पर अनूठी परंपरा, पर्यावरण संरक्षण के साथ औषधीय गुणों का संदेश

आचार्य के चौक स्थित किसन जसोदा कुंज परिसर में हुआ आयोजन, 500 से अधिक पौधों का वितरण

बीकानेर // खेल लेखन की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले झंवर लाल व्यास ‘रंगीला’ की स्मृति को उनके परिजन और शुभचिंतक पिछले 21 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण की मुहिम के रूप में जीवंत बनाए हुए हैं। दशहरे के अवसर पर उनकी जन्म जयंती के उपलक्ष्य में तुलसी के पौधों का निःशुल्क वितरण करने की यह परंपरा इस वर्ष भी जारी रही। आचार्य के चौक स्थित किसन जसोदा कुंज परिसर में आयोजित कार्यक्रम में 500 से अधिक तुलसी के पौधे वितरित किए गए। इस पहल के माध्यम से अब तक 10 हजार से अधिक पौधे लोगों तक पहुंचाए जा चुके हैं।

रंगीला की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति से जुड़ने और हर घर तक तुलसी पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास भी है। आयोजन के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण, पौधों के महत्व और तुलसी के औषधीय गुणों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

श्रद्धांजलि के साथ याद किया रंगीला का योगदान

कार्यक्रम की शुरुआत झंवर लाल व्यास ‘रंगीला’ के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इसके बाद शिक्षाविद डॉ. संजय आचार्य, भारतीय मजदूर संघ के नेता बृजराज आचार्य, वरिष्ठ अधिवक्ता बसंत आचार्य और बाल कल्याण समिति के पूर्व अध्यक्ष जुगल किशोर आचार्य ने तुलसी के पौधों का वितरण किया।

कार्यक्रम संयोजक दुर्गा शंकर आचार्य ने रंगीला के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्होंने खेल लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। देशभर के अनेक समाचार पत्र-पत्रिकाओं में उनके खेल संबंधी आलेख प्रकाशित होते थे। खेलों की बारीकियों को समझने और उन्हें पाठकों तक रोचक ढंग से पहुंचाने की उनकी विशेष शैली ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। खेल लेखन के साथ उनकी पत्रकारिता में भी गहरी रुचि थी। वे राजस्थान लेखा अधीनस्थ सेवा में कार्मिक थे, लेकिन खेलों के प्रति उनका जुनून उनकी विशिष्ट पहचान बना।

निधन के बाद भी जारी है सेवा का सिलसिला

रंगीला का 3 जनवरी, 2006 को महज 42 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। उनके जाने के बाद उनकी स्मृति और आदर्शों को जीवित रखने के उद्देश्य से रंगीला फाउंडेशन का गठन किया गया। इसके बाद से संस्था लगातार ऐसे आयोजन करती आ रही है, जो खेल, समाज और पर्यावरण से जुड़े हैं।

फाउंडेशन की गतिविधियों में प्रतिवर्ष शतरंज प्रतियोगिता का आयोजन, खेल दिवस पर ‘रंगीला रत्न अवार्ड’ प्रदान करना और दशहरे के अवसर पर तुलसी के पौधों का वितरण प्रमुख हैं। इन आयोजनों के जरिए रंगीला के खेलों के प्रति समर्पण और सामाजिक सरोकारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

मोहित व्यास ने संस्था की गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि तुलसी वितरण का आयोजन वर्ष 2006 से लगातार किया जा रहा है। शुरुआती वर्षों में यह कार्यक्रम लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर में आयोजित होता था। पिछले पांच वर्षों से आचार्य के चौक स्थित रंगीला फाउंडेशन कार्यालय परिसर में यह आयोजन हो रहा है। दो दशक से अधिक समय से जारी इस परंपरा ने शहर में एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

हर घर में तुलसी, हर मन में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी

कार्यक्रम में वक्ताओं ने तुलसी के धार्मिक, आध्यात्मिक और औषधीय महत्व पर चर्चा की। चंद्रकला आचार्य ने बताया कि तुलसी भारतीय जीवन परंपरा में विशेष स्थान रखती है। इसके गुणों को लेकर विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययन भी हुए हैं। तुलसी को घर में लगाने से लोगों का प्रकृति से जुड़ाव बढ़ता है और इसके पारंपरिक उपयोगों के प्रति जागरूकता आती है।

आयोजकों का उद्देश्य है कि तुलसी का पौधा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनकर न रहे, बल्कि प्रत्येक घर में हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे। पौधों का वितरण लोगों को अपने घरों में पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए प्रेरित करता है। तुलसी के औषधीय गुणों की जानकारी के साथ यह पहल प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी प्रदान करती है।

कार्यक्रम का संचालन रोहित व्यास ने किया तथा विनीत व्यास ने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने रंगीला के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए उनके आदर्शों का अनुसरण करने तथा अपने जीवन में बेहतर कार्य करने का संकल्प लिया।

खेल लेखन के माध्यम से पहचान बनाने वाले रंगीला की स्मृति में हर वर्ष वितरित होने वाला तुलसी का पौधा इस बात का प्रतीक है कि किसी व्यक्ति का योगदान उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता। अच्छे विचारों और जनहित से जुड़े कार्यों के माध्यम से स्मृतियां पीढ़ियों तक जीवित रह सकती हैं। रंगीला फाउंडेशन की यह पहल इसी भावना को आगे बढ़ा रही है।