



पीरदान हर्ष की पहल, पीढ़ी दर पीढ़ी निभा रहे पुरुष; सामूहिक गणगौर सजावट, आरती और गीत बने आकर्षण
बीकानेर // गणगौर पर्व के मौके पर शहर के हर्षों के चौक में दशकों पुरानी परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। यहां पुरुषों द्वारा गणगौर माता के पारंपरिक गीत गाने की अनूठी परंपरा क्षेत्रभर में विशेष पहचान बनाए हुए है।

इस परंपरा की शुरुआत पीरदान हर्ष ने की थी, जिसे आज भी उनके वंशज और मोहल्ले के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। आयोजन के दौरान पूरे मोहल्ले की गणगौर को एक साथ सजाया जाता है, जिससे सामूहिकता और उत्सव का माहौल बनता है।
सामाजिक कार्यकर्ता खुशालचन्द हर्ष ने बताया कि कार्यक्रम में विशेष आरती का आयोजन किया जाता है और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग शामिल होकर आस्था का प्रदर्शन करते हैं। हर्षों के चौक में पुरुषों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक गणगौर गीत इस आयोजन की खास पहचान हैं। गीतों की गूंज पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना देती है। जैसे—
“गोर गवर गोर गवर, गोमती पूजन आई,
ईसर पूजे पार्वती, सुहागन सुख पाई।”
“खेलण दो गणगौर, म्हाने खेलण दो गणगौर,
म्हारी सखियां संग आज, साजण रो त्योहार।”
“आवो जी आवो गणगौर माता, थारो सिंगार करां,
ईसर जी साथ बिराजो, म्हारो आंगण भरां।”
ये पारंपरिक गीत न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाते हैं, बल्कि लोक संस्कृति को जीवित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
ये पुरुष निभा रहे परंपरा
अबीर चन्द हर्ष, बंशीधर हर्ष, करणीदान हर्ष, शिवलाल हर्ष, श्यामसुंदर हर्ष, कुशालचंद हर्ष, गिरिराज हर्ष, बलदेव व्यास, बृजरतन हर्ष, अनंत कुमार हर्ष, हर्षवर्धन हर्ष, सुशील बोहरा, युगल हर्ष, मुकेश हर्ष, नितिन हर्ष, गोपाललाल हर्ष, नंदू हर्ष, इन्द्रचंद हर्ष, शौर्य प्रताप हर्ष सहित कई लोग इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
इन लोगों का मानना है कि इस तरह की परंपराएं समाज में एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत बनाती हैं, इसलिए इन्हें सहेजकर रखना बेहद जरूरी है।




