पुष्करणा सावा में विष्णु रूप धारी दूल्हे की टूटती मर्यादा के पीछे आखिर कौन है जिम्मेदार !!

समाज

लक्ष्मीनाथ मंदिर के कथा वाचक पं. विष्णु कांत शास्त्री की कलम से पढ़िए परम्परा में आ रही गिरावट पर एक विशेष आलेख

बीकानेर // राजस्थान की धरा सदियों से अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और मर्यादाओं के लिए जानी जाती रही है। उन्हीं गौरवशाली परंपराओं में से एक है बीकानेर का पुष्करणा सावा—एक ऐसी वैवाहिक परंपरा जो केवल विवाह नहीं, बल्कि धर्म, आस्था और संस्कार का अद्भुत संगम थी। इस परंपरा में दूल्हा विष्णु रूप धारण कर विवाह के लिए जाता था, मानो स्वयं नारायण लक्ष्मी का वरण करने आ रहे हों। यह केवल वेशभूषा नहीं, बल्कि उस भावना का प्रतीक था कि विवाह एक पवित्र संस्कार है, मनोरंजन या प्रदर्शन नहीं।परंतु आज समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही है। पुष्करणा सावा 2026 में तो स्थिति यह रही कि सैकड़ों विवाहों में केवल तीन-चार दूल्हे ही विष्णु रूप में दिखाई दिए। उनकी जगह अब आधुनिक फैशन, स्टाइलिश दाढ़ी, फिल्मी अंदाज और तेज डीजे ने ले ली है। ऐसे में प्रश्न उठता है—इस टूटती मर्यादा के लिए जिम्मेदार कौन है? सिनेमा? माता-पिता? या स्वयं समाज और नई पीढ़ी?

सिनेमा और आधुनिक प्रभाव

आज की पीढ़ी का सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत सिनेमा और सोशल मीडिया बन गया है। फिल्मों में दिखाए जाने वाले भव्य बारात, डीजे, डांस और फैशन युवाओं को आकर्षित करते हैं। विवाह अब संस्कार से अधिक “इवेंट” बनता जा रहा है। जब युवा फिल्मों और इंटरनेट से अपनी पहचान गढ़ते हैं, तो परंपराओं का स्थान धीरे-धीरे आधुनिक दिखावे ने ले लिया है। इसलिए कहीं न कहीं सिनेमा और आधुनिक संस्कृति भी इस बदलाव के लिए जिम्मेदार है।

माता-पिता की भूमिका पर सवाल

पहले परिवार परंपराओं के संरक्षक होते थे। माता-पिता अपने बच्चों को यह समझाते थे कि परंपरा केवल पुरानी रीति नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान है। आज कई माता-पिता स्वयं आधुनिक दिखावे को प्राथमिकता देते हैं—भव्य होटल, डीजे, थीम वेडिंग—परंतु परंपराओं के पालन पर उतना ध्यान नहीं देते। जब घर ही परंपरा के प्रति उदासीन हो जाए, तो नई पीढ़ी से उसकी अपेक्षा कैसे की जा सकती है? इन सब के पीछे माता-पिता भी जिम्मेदार है क्योंकि वह बचपन से बच्चों को उचित संस्कार नहीं दे पा रहे हैं।

कन्या और नई पीढ़ी की सोच

समाज का एक और पहलू भी सामने आता है। आज कई युवतियाँ भी आधुनिक रूप-रंग और फैशन को अधिक महत्व देती हैं। यदि समाज में विष्णु रूप को “पुराना” या “अजीब” समझा जाने लगे, तो दूल्हा भी वही रूप अपनाता है जो समाज में स्वीकार्य और आकर्षक लगे। यहाँ दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि बदलती सामूहिक मानसिकता का है।

असली समस्या: मानसिकता का परिवर्तन

वास्तव में समस्या सिनेमा, माता-पिता या किसी एक वर्ग की नहीं है। समस्या यह है कि हमने परंपराओं को “गर्व” के बजाय “पुरातन” मानना शुरू कर दिया है। जबकि यही परंपराएँ हमारी पहचान हैं। यदि हम अपनी जड़ों से कटते गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल नाम भर की संस्कृति जानेंगी।

समाधान की दिशा

जरूरत इस बात की है कि समाज जागरूक हो। विवाह को केवल मनोरंजन नहीं, संस्कार के रूप में देखा जाए। परिवार बच्चों को परंपराओं का महत्व समझाए। समाज में ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ जहाँ विष्णु रूप धारण करने वाले दूल्हों का सम्मान और प्रोत्साहन हो। यदि समाज गर्व से कहे—“यह हमारी पहचान है”—तो युवा स्वयं इसे अपनाने लगेंगे।

निष्कर्ष

पुष्करणा सावा की परंपरा केवल एक वेशभूषा नहीं, बल्कि हजार वर्षों की आस्था, संस्कृति और मर्यादा का प्रतीक है। यदि आज हम इसे नहीं बचाएंगे, तो कल यह केवल पुस्तकों और स्मृतियों में रह जाएगी।मर्यादा टूटती नहीं, छोड़ी जाती है।
और संस्कृति बचती नहीं, निभाई जाती है। बीकानेर की पहचान, उसकी परंपरा और उसका गौरव हमारे हाथों में है। यदि हम जाग गए, तो विष्णु रूप फिर से लौटेगा—और यदि नहीं, तो यह केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।


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