कटारनाथ भैरव मंदिर के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया, समाज ने बढ़ाया सहयोग का हाथ

धर्म-कर्म

जर्जर हो चुके ऐतिहासिक मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए रामकुमार पुरोहित व श्रीबल्लभ पुरोहित ने 51-51 हजार रुपए देने की घोषणा

समाज के लोगों से निर्माण सामग्री व आर्थिक सहयोग की अपील

बीकानेर। जस्सूसर गेट के अंदर बिनानी निवास वाली गली में स्थित मानावत पुरोहित ब्राह्मण समाज की बगीची में विराजमान बरसों पुराने कटारनाथ भैरव मंदिर का जल्द ही जीर्णोद्धार किया जाएगा। वर्षों से देखभाल के अभाव में मंदिर का भवन जर्जर हो चुका है, जिसके कारण समाज के लोगों में इसकी मरम्मत और संरक्षण की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। अब समाज के दो समाजसेवी आगे आए हैं और मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया है।

समाजसेवी रामकुमार पुरोहित एवं श्रीबल्लभ पुरोहित ने मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य के लिए 51-51 हजार रुपए के सहयोग की घोषणा करते हुए समाज के अन्य लोगों से भी इस पुण्य कार्य में सहभागी बनने का आह्वान किया है। दोनों समाजसेवियों का कहना है कि यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि मानावत पुरोहित समाज की सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक भी है। ऐसे में इसका संरक्षण और पुनर्निर्माण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके अलावा श्रीगोपाल पुरोहित, राजेन्द्र पुरोहित व नानू पुरोहित ने भी सहयोग का वादा किया है।

रामकुमार पुरोहित ने बताया कि मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य समाज के सहयोग से चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक परिवार एवं समाजबंधुओं से अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग देने के साथ-साथ सीमेंट, ईंट, बजरी, पत्थर, सरिया तथा अन्य निर्माण सामग्री के रूप में भी योगदान देने की अपील की गई है।

उन्होंने कहा कि समाज की एकजुटता से यह ऐतिहासिक मंदिर फिर से अपनी भव्यता प्राप्त करेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था एवं संस्कृति का केंद्र बना रहेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि समाज के लोग बढ़-चढ़कर इस धार्मिक एवं सामाजिक अभियान में भागीदारी निभाएंगे, जिससे कटारनाथ भैरव मंदिर का जीर्णोद्धार शीघ्र पूरा किया जा सकेगा।

समाज के वरिष्ठजनों ने भी इस पहल का स्वागत करते हुए इसे समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला प्रयास बताया और अधिक से अधिक लोगों से सहयोग की अपील की। उनका कहना है कि धार्मिक धरोहरों का संरक्षण केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।